अन्य जाति से फरक तरिकासे मनात हएँ रानाथारू तिज

अन्य जाति से फरक तरिकासे मनात हएँ रानाथारू तिज

धनगढी, ७ सामन ।

सामन सुशलपक्ष अर्थात सामनकि उजियारीको तृतिय तिथि के दिन तिज तिउहार मनाहए । सामन महिनाकि अँधियारसे गाव गावकि  मे  डोला डारन शुरू करत हएँ । परम्परागत पोसाकमे सजके रानाथारू समुदायकि महिला डोला डोलके सामन महिनामे गानबाली परम्परागत गीत गात हए । खेतीपती सब निभटएके फुरसदसे व्याहि लैठिया अपन  माइकोमे अतहएँ । अभय कैलाली और कञ्चनपुरकि रानाथारू बस्तीमे तिजको रौनक हए ।

जा तिउहार  एक पाख भर डोला डोलके  मनातहएँ । डोला डारनमे सब जनि सहयोग करत हएँ । भाइया बहिनिया मिलके जंगलसे बाइब काटके लातहए । बोके बटके मोटोसो बरहा बनात हए । बहे बरहा डारके डोला डारत हएँ । जा तिउहार भाइयाबहिनियाँ  बीचको आत्मीयता बहुत  प्रगाढ बनात हए कहिके विश्वास रानाथारू समुदायमे करत अएहए ।

संकटसे मुक्ति पान महिला ददा,भइयाभतिजोक जीवनरक्षा, दीर्घायु, सुख और समृद्धिक ताँहि व्रत बैठत हए ।सामन महिनाक उजियारिक तृतीयाक दिन तिजको मुख्य दिन मानत हए । जा दिन दिदीबहिनी निराहार व्रत बैठनको चलन हए । व्रत बैठी दिदीबहिनीयँ ब्रत खोलन ताँहि  सिमही, गुलगुला, पुरीलगायत परम्परागत परिकार पकात हए ।

ब्रत बैठी महिला साँझ होनलागत हए तव नदीयके किनारे जाइके झुडकि पुहात हए । गडरौदाँ जातको घाँस या कुसमे ब्याहि महिला सात औ बिन व्याहि लैडिया पाँच गाँठी बाँधत हए औ बुक पूजा करत हए । पूजा निभटएके चाँदीक गहना वा सिक्कासे बुक काटत हए और प्रसादके रूपमे सब परिकार धरके नदीमे पुहात हए ।

पोहान पेती दिदीबहिनीय अपन भइयाभतिजोक धन सम्पत्ति प्रगति और दीर्घायुको कामना करत हए ।और कहत हए कि जैसी जैसी नदिय बढए वीसि मिर भइया भतिजोनकि उमर बढए कहिके कामना करत हए । और जब बर्त खोलके घर लउटत पेती  भइयाभतिजो  दिदीबहिनीयनके डगरमे पटाकि बेढके रोकत हए उनसे पुर सिमहि ( प्रसाद­) मागत हए ।

तिजको तिउहार माननको एक कहानि हए ?

बहुत पहिले परापूर्वकालमे बेहमैया नावकि दिउतिन बुढिया रहए बो तिजको व्रत बैठी रहए और तवहिसे ज तिउहारको सुरुवात भव हए कहत हए  । नदिया किनारे बैठी बेहमैया  गडरौदा जातको घाँसमे गाँठी बाँधके अपन भाइभतिजाक नामसे पुहाइ पर बो नपुहो तव बेहमैया रोन लागय और जब बो गँठीबालो घाँस पुहिजाबए तव बो हँसन लागए  जा बात  गैरा–पार्वती मृतलोकमे घुमन निकरी रहए तव बे बडध्यानसे देखत हए ।

तव बे गैरा पार्वति ढिगै जाइके बेहमैयासे  रोनको और हँसनको कारण पुछि हए ।तब  गैरा पार्वतीके बतात बेहमैया कहि जउनक नावसे गाँठि बाँधक पुहात है त पुहिजात हए बो अपन उमर भर बचैगो और जैनक नवकि गाँठी बाँधके पोहत हा तब बो नपुहत हए तब बो अपन उमर भर नबचपाबैगो तहि मय कभि रोत है और कभि हँस्त है । अपन भइयाभतिजोक बचान ताँहि अब मय का करै तब गैरापार्वति भइयाभतजोके बचान ताँहि  व्रत बैठन और दीर्घायु कामना करन गडरौदामे गाँठी बाँधके नदीयमे पोहन कहि तवहिसे व्रत बैठन चलन सुरु भव कहत हए । एेसि करके रानाथारू समुदायमे तिज तिउहार मनात हए ।

अन्य समुदायमे श्रीमानको दीर्घायुको कामना करन ताँहि तिज व्रत बैठन चलन हए कहेसे जा समुदायमे भइयाभतिजोको दीर्घायुको कामना करके  संस्कृति मानत अए हए । एक और कहनी कहत हए ‘परापूर्वकालमे  समुदायमे दुःख बिमार पडके पुरुषको मृत्यु होनलागो तब जा संकटसे बचन ताँहि महिला भइयाभतिजोको जीवनरक्षा, दीर्घायु, सुख और समृद्धिक कामना करन व्रत बैठत अइरहि कहिके जनविश्वास हए ।

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