रानाथारु गावमे ब्याहको रौनक

रानाथारु गावमे ब्याहको रौनक

नारायन राना
कृष्णपुर न.पा ९, पिपरिया, कञ्चनपुर

धनगढी,६ माह ।

रानाथारु गावमे अभय ब्याहको रौनक हए । माघ महिना भर ब्याह होतहए । व्याहके रानाथारु उत्सबके रुपमे मानत हएँ गावमे कोइ घरमे व्याह हए कहेसे गावभरके लौडालौडिया ह्रसउल्लासमय बातावरणमे गावभर रौनक छाओ होतहए । आजसे करिब दश बर्ष पहिले ब्याहमे बरैतिय औ ढाइदुलेहरा घर घरसे लढिया मचियाके ब्याह खानके जात रहएा । अभय हरेक रानाथारु गावमे व्याहको रौनक हए ।

ब्याह सर्बव्यापी शब्द हए । दुनियाँकी सबय देश, समुदायमे जा शब्दके अपन अपन बुझाइ अनुसारके शब्द बोलचालमे हएँ । व्याह शब्द नातेदारीकी सबसे बडी जर हए तबही ता रानाथारु समुदायमे मगनी लगानपेति घोंघाकी जर पूँछे करत हएँ, नातेदारी पता लगात हएँ । जहेमे दुनियाँ टिकी हए, जहे नातेदारीको सम्बन्धसे आदमी आदमी बीच भाइचारा औ अपनो बिरानो को सम्बन्ध हए । देश समुदायको व्यवस्था औ आदमीको अवस्था व्याहको तरिकामे बदलाव लात हए तबही दुनियाँमे तमान मेलके व्याह देखन मिलत हएँ ।
व्याह संस्कार एक बहुत जरुरी सामाजिक व्यवस्था हए हर आदमीके जिन्दगीमे जा संस्कारके बन्धनमे बंधन पडत हए । ब्याह सुनत पेती दूइ आदमी (लौंडा लौंडिया) बीचको सम्बन्ध हानी लगत हए पर खासमे उनको सम्बन्ध इकल्लो व्याह ना होत हए । व्याहके दिनसे बे लौंडा लौंडिया लोगा बैयरको नातेदारीमे बँधजात हएँ, उनके ऐया दौवा समधी समधीन औ ऐसि जित्तो नातेदार लौंडाके होत बे सब लौंडियाके नातेदारसे नयाँ नातेदारी हुइजात हए । एकए व्याहसे जगब भारी नातेदारी बढ्जात हए । ऐसो नातेदारी जोरनमे व्याहको सबसे भारी रोल होत हए औ जा व्याहके फिर बहुत मेलके अपने अपने नियम होत हैं खासमे बे नियम समुदाय, जाती, चलन अनुसार अलग अलग होत हएँ । ऐसि कुछ ब्याहके नियम रानाथारु समुदायमे फिर हैं ।

मगनी

रानाथारु समुदायमे ब्याह करन ताहीं लौंडा लौंडियक् मगनी होन जरुरी होत हए । मगनी । मगनी लौंडा औ लौंडिया दुने घेनसे नातेदारी जोरनको एक संस्कार हानी हए, मगनीके दिनसे उनको नातेदारी सामाजिक मान्यता पात हए । कोइ कोइ आदमी मगनी से मिलन फिर कहत हैं । बच्चाको ब्याह करनताहीं दुने पक्ष मिलन जरुरी होत हए बो मिलन करबानबालो, दुने घेनसे बात मिलान बालो आदमीसे मझपतिया कहत हएँ । पहिले औ आजकालकी मगनीमे बहुत अन्तर हुइगओ हए । पहिले पहिले छोटे छोटे बचपनमे ऐया दौवा मगनी कर्देत रहैं, पर ब्याह बडेमे करत रहैं, जा ऐसो कुप्रथा आजकल नैया । पहिलेके अनुसार खास कर्के चैत, बैसाख, जेठ महिनामे इतबार औ बिसपतके दिन मगनी करनको चलन होत रहए । लौंडा घेनसे २÷४ लढियामे कम्तिमे एक सन्दूखा (बकसा) औ ७÷८ घल्लामे पेंडा, खोया, लड्डू, खोपडा भरके गस्ती(रुमाल) से मोहडो बाँधके गाओंके जनैया मनैयाके संगए नातेदार औ नचकरहीया आदमी (लौंडा लोग) जाए करत रहैं । उनसे मगनाहरा कहत रहैं एक रात लौंडियाके घरमे नाचगान करतए बहुत हँसीमजाक, जनौनी प्रतिस्पर्धा फिर चल्त रहए । पहिलेक ऐया दौवनके जा मगनीको पेंडा, लड्डुको बडो लालच होत रहए तबही पहिले पहिले तमान आदमी अपन बच्चा(लौंडिया)से खोया, पेंडा जैसे शब्दसे बुलाए करत रहैं जो पिच्छु उनकी नाओं बन्जाए । गाउँघर औ नातेदारको सम्बन्ध बढिया बनानमारे मगनी खान अपन गाओंभरसे आदमी बुलानको चलन रहए औ बो लड्डू पेंडा लौडियक नन्सारके नातेदार तक बैना के रुपमे पुगत रहए ।
समयको बदलावसे आजकाल ऐसो देखन दुलम्मो हुइगओ आजकाल चट्ट मगनी पट्ट ब्याहा को मान्यता बढिगओ हए । पहिले ऐया दौवक् मनकी मगनी होत रहैं आजकल लौंडा लौंडिया दुनेको मन चित्त बुझाएके मगनी होत हैं, जमानमे होत हैं । पहिले अपनी जातीमे इकल्लो मगनी होत रहैं पर ब्याहमे लौंडा लौडियाको स्वतन्त्रता, प्रविधी, शिक्षा, सम्बन्ध बढो के मारे आजकाल अन्तरजातिय व्याह फिर देखन मिलन लागे हैं । अभेफिर इतबार औ बिस्पतको दिन लौंडा पक्षके सल्लाह भओ दिन गाओंके जनैया मनैया औ नातेदार, कुर्मागोंत लौंडियाके घरमे जाएके मगनी करन जानको चलन हए, लौंडा लौंडिया एक दुसरेके माला लगाएके टिकाटाला करत हैं औ नयाँ नातेदारी सम्ध्यानो करत हैं, बहुत से आदमी जहे दिन सल्लाह अनुसार ब्याहको दिन फिर धरलेत हैं ।

बैना

रानाथारु समुदायमे बैना देनको चलन रहए । जब लौंडा लौंडिया लचपचे जमान हुइजात रहैं, ब्याहसे कुछ महिना दिन पहिले लौंडा घरसे मझपतिया औ घरके मुखिया बैना देनको चलन रहए बैनाके नाओंमे जलेबी औ मिठाई लैजानको चला रहए । बैना बिस्पत औ इतबारके दिन लैजाए करत रहैं । आओ भओ बैना लौंडिया पक्षके आदमी अपन कुर्मागोंत औ नन्सार तक पुगत रहए । आजकाल जैबिल्लो आदमी बैना देत हए, बहुत कम हुइगओ हए जा चलन फिर । जा चलनसे फिर सम्ध्यानोकी नातेदारी सम्बन्धमे सुधार होत रहए ।

पूँछैछो

लौडा पक्षसे लौंडिया घरमे व्याह करैगे कि ना जा पूँछन जानको चला से पुँछैछो कहत हैं । मझपतिया या कोइ माध्यमसे जब ब्याह करनको दिन धरजात रहए ता व्याहको दिनसे १२ दिन पहिले पुँछैछो करनको चलन रहए । लढियामे कुछ जनैया मनैया आदमी मछरी लैके लौंडिया घरमे जात रहएँ । इतबारके पूँछैछो होतो त बिस्पतके व्याह औ विस्पतके पुँछैछो ता इतबारके व्याह होत रहैं । रानाथारु समुदायमे पुँछैछोको दिनसे व्याहको सुरुवात हुइजात रहए, जहे दिन चूल्ही डारनको चलन हए । लौंडाके व्याहमे ७ चुल्ही औ लौंडियाके व्याहमे ५ चुल्ही डारत हैं । चुल्ही खास कर्के भुजैन मनै डारत हैं । पुँछैछो औ व्याहको सम्बन्ध दुइ पखिया होन पडत हए, अगर पुँछैछो अँधियारीको पाखमे होत हए ता व्याह उजीयारो पाखमे होत हैं । एक पखिया ब्याह अशुभ मानो जात हए रानाथारु समुदायमे । आजकाल जा पुँछैछो दुर्लभ हुइगओ हए । आजकाल चट्ट मगनी पट्ट व्याहके मारे जद्दासे ब्याह मगनीके दिन धरजात हैं, औ बहुत व्याह त घरघुसैला होत हैं जो से भागि व्याह फिर कहत हैं, जो मे पुँछैछो की जरुरत ना पडत हए पर चुल्ही डारनको चलन अभए फिर देखन मिल्त हए ।

चौका

ब्याहसे पहिले घरमे चौका लगानको चलन हए । रानाथारुके घर खासमे कच्चे होत हैं ब्याहसे ४ दिन पहिलेको दिन घरमे पडोरत÷चौका लगात हैं जा दिनसे छिया चौका फिर कहत हैं जा दिनको भोर भएको दिन फिर चौका लगात हैं बो दिनसे अच्छो चौका कहत हैं । घरको सरसफाइ औ दिउतामे मट्टी लगानको दिनसे चौका को दिन कहत हैं । चौका भुजैन मनै लगात हैं । अच्छो चौका लगानको सँझाके दिन चूल्ही बैठारत हैं बहे दिनसे चुल्हीमे खानु पकात हैं । जा दिनसे ब्याह बाले घरमे भुजैन मनै खानु पकात हैं । ब्याहमे खानु पकानबाली भुजैन अपन घरकी ना होत हएँ गाओंकी महिला सहयोगी होत हैं।

कस्टेइ

ब्याह के एक दिन पहिले कस्टेइ करनको लन हए । सबेरेक पहरमे घर भर्रा दिउता देखके दिउताके पूजनाके रुपमे सबेरेस कस्टेइ करन जानको चलन हए । अगियारी, मिठाइ, डोरा, कुढारी लैके जात हैं । बन किनारेके रुखामे लौंडाको ब्याहमे ७ फेरा औ लौंडियाको ब्याहमे ५ फेरा हर्दीबारो डोरा लबेटनको चलन हए, जा ऐसो लबेटनसे घरके दरिद्र, प्रेत, सैंरहा जैसे प्रेत आत्मा बाँधो जानको मान्यता हए । रुखाकी पूजा पाठ कर्के मिठाइ बाँटके थोरी बहुत कठीया कर्के लात हएँ, बहे कठिया पजारके जा दिनको खानु पकात हएँ, लौंडाको व्याहमे कुम्हडाको चखना पकान जरुरी होत हए ।


भुइयाँ पूजन

रानाथारु ब्याहमे भुइयाँ पूजनको चलन हए । सबेरे कस्टेइ कर्के घरके दिउताको पूजा होत हएता बहे दिन सन्झाके गाउँ भरेक देवता भुईयाँ पूजनको चलन हए । सन्झाके अखबन्नी बखत मिठाइ, कण्डाकी अगियारी, पुरी, मलिदा, साकिल, डोरा जैसे पूजाके समान लैके चाकर औ गौंटेहर सहीत ब्याह घरबालेकी एक मूख्य महिला औ व्याह खानी महिला भुईयाँमे पूजा करन जात हैं । भूइयाँमे गौंटेहरा आदमी पूजा करत हएँ, पूजा करके रुखा, हँगा चहूँ कोइ कठ्ठाको समानमे भुइयाँमे डोरा लबेटनको चलन हए, कस्टेइ हानी लौंडाको ब्याहमे ७ औ लौंडियाको ५ फेरा लबेटनको चलन हए । ब्याहमे भूत ब्यार, रोग, खराब नजर बन्देज करन (बाँधन) ताहीं डोरा लबेटनको चलन हए । भूइयाँ पूजके प्रसादके रुपमे पूरी, मलिदा जैसे चिझ बाँटत हएँ, गाँव घरमे फिर बहे प्रसाद बाँटत हएँ । जहे रातके पुरी पकात हएँ, महिला आदमी गीत गातए ब्याहके ताहीँ पुरी पकात हएँ ।

हर्दी लगान

दुलहा दुलहीनके हर्दी लगान एक बहुत जरुरी नियम हए ब्याहके ताहीँ । जहे दिन कर घर घर सबएके दिउतामे निउतो डारत हैं । लौंडा आदमी अपन जिन्दगीमे ७ चोटी तक हर्दी लगबान पात हैं पर लौंडिया १ चोटी इकल्लो । दुलहा दुलहीनकी दिदिबहिनिया, भौजी हर्दी कुटत हएँ, गीत फिर गात हैं औ चौक फिर पूरत हैं । कोला औ दिउताके अग्गु चौक पूरके बहेक उपर बैठाएके हर्दी लगात हैं । दुलहाके बार काटके हर्दी लगात हैं । हर्दी लगान पेती गडुवा (कलश)मे दिया पजारत हैं औ दुलहाके कटारो पकडन जरुरी होत हए । दुलहाके बहनुइया फिर तरबार लैके ठाडत हएँ । कुछ दक्षिना दैके पालापाली नातेदार औ गाँओबाले हर्दी लगात हएँ । निउँतो फिर जहे समयमे डारत हैं । निउतो डरैयाके थोरी थोरी प्रसादके रुपमे मिठाइ, पुरी बाँटनको चलन हए ।

अचरा रोकन

हर्दी लगाएके उठी भइ रुपैया, दक्षिना मागनसे अचरा रोकन कहत हएँ । दुलहाकी अइया सेता लत्ता (पिछौडा) मे दुलहाके पींठ पिच्छु बैठके अचरा रोकत हएँ, बो अचरामे दुलहा मनैं हरदाहरी रुपैया डारत हएँ । ब्याहके बाद फिर लौंडा कमाएके अपन अइया दौवाके पालन जिम्मेवारी बोध होबए कहिके जा चलनको सांकेतिक मान्यता हए, ब्याहके बाद अइया दौवा पींठ पिच्छु रहिके हात पसारन पडैगो, अग्गू ता अब नैदुलहीन होइगी ।

बहनुइया

ब्याहमे दुलहा तरफ बहनुइयाको बडो हात होत हए, दुलहाके जीजा बहनुइया बन्त हएँ । हर्दी लगानसे निन्हारो तक बहनुइयाको बहुत बडो भुमिका रहत हए दुलहाके दिदीबहिनिया हँदवात हएँ , हँदवाएके बहनुइया कोठामे लैजाएके दुलहाके झगिया पैंधात हएँ औ पगाह बाँधत हएँ ऐसेमे सब सम्हारन औ रेखदेख करनमे सब जिम्मेवारी दुलहाके बहनुइयक् होत हए ।नयाँ कपडा लगात हएँ बे कपडाके धागा दुइताके चढात हएँ । फेंटा औ पगाह १२ औ ९ हातके बनानको चलन हए, अलगा ७ हातको, सब कपडा सेतो सफेद होत हएँ । ब्याहन जान पेती कटारो औ बटुवा दुलहाके संग होन जरुरी होत हए । औ बहनुइया तरबार फिर लैजान पडत हए, बराइतमे ढाल फिर बाँधोजात हए । कटारो, ढाल तरबार संकेतिक हतियार हएँ । दुलहा राजाके रुपमे होत हए औ बराइतके उपर छतुरी, मुरछल श्रीपेचको संकेत । दुलहाको पैंधाव झगिया, पगाह, फेंटा लडाकू राजाको झींझक देत हए । दुलहाके चौकीदार हानी रेखदेख करैया बहनुइया रहत हएँ, दुलहाके कोइ फिर समस्या पडएता बहनुइयाके विहुरन, झेलन पडत हए । कोला औ दिउतामे ढोक लागके ब्याहन जानसे पहिले आजकाल दुलहाके टीका लगान चलन हए, टीका लगाएके निउतहरसे आशिर्वाद लैके बराइतमे बैठात हैं ।

कन्हारो

बराइत घरसे निकारन पेती बराइत तरे दुलहाकी दिदी बहिनिया नाचनको चलनसे कन्हारो कहत हएँ । दुलहाके बहनुइया बराइत बोकत हएँ, निउतहर बैयर मनै निउछार करत हएँ, गीत फिर गात हएँ । बाजाके तालमे बराइत जातपेती नाचन बालो नाच से कन्हारो कहत हएँ । दुलहा सँग कभि कभि दुलहाके छोटे छोटे भैया फिर बराइतमे थोरी दूर तक बैठत हएँ उन्से छैबिल्ला कहत हएँ । पहिले पहिले मतबरिया बराइत देखन मिल्त रहएँ आजकल मतबरिया बराइत दुलम्मो हुइगओ हए । बराइतके चारौ बाँसमे एक एक छोटे बच्चा मुरछल पकडके ठाडके जानबाली बराइत से मतबरिया बराइत कहत हएँ ।

बरैतिया, दुलहेरा

बराइत संग् ब्याहन जानबारे सबए आदमीसे बरैतिया कहत हैं। दुलहीन तरफ से आनबारेसे दुलहेरा या ढहैया कहत हएँ । बरैतियाको खानु दुलहा घर होत हए, औ ढहैयाको खानु दुहिन घर । ब्याहसे आएके फिर सँझाके पहरमे दुलहेरा या बरैतियाको खानु ब्याहबाले घर होत हए , उनहीके घर खान पडत हए । बराइतके संगए दुलहाके तरफसे दुलहीनके ताहीँ कपडा, दूध हँडिया, मछरी सृगार बक्स जैसे चिझ लैजात हएँ, पाँए पूजन बखत दलहाको दओ भओ कपडा लगात हैं दुलहीन ।

कर्स रोकन

बराइत दुलहीनके घर कुचनसे पहिले दुलहीनकी भौजी, दिदी ललो स्वागत करनको चलन हए, जा चलनसे कर्स रोकन कहत हएँ । दुलहिनके लैके आएके दुलहाके घर फिर कर्स रोकनको चलन होत हए, जहाँ दुलहा की भौजी, दिदीबहिनिया कर्स रोकत हएँ । कलस, सर्बामे दिया पजारके कर्स रोको जात हए । आजकल स्वागत गेटमे रीबन कटबाएके, फुलंगा फुरबाएके, मिठाइ खबाएके स्वागत करनको चलन दीखाइदेत हएँ ।

बरैतिया जिमान

दुलहीन घर आएभए बरैतियाको खानु बराइतके दिन दुलहीन घर ना होत रहए । दुलहिनके नातेदार, परोसी या कुर्मा घरके आदमी बरैतियाको अपन घर खबानको चलनसे बरैतिया जिमान कहत हएँ । खास करके करबरेहा आदमी बरैतियाके खानाु खबान लैजात रहैं रातके ऐसेमे पहिले थोरी मजाक के रुपमे बहानको चलन रहए । आजकल फिर कुइ बरैतिया जिमानको चलन हए पर बहानको चलन नैया ।

पाँए पूजन

दुलहा दुलहीनके सँगए बैठारके घिउ, पानीसे गोडो धोनको चलनसे पाँए पूजन कहत हएँ । लौडियाके हितुवा नातेदार घरके पाँए पूजत हएँ । दुलहीनके नातेदारीमे सबसे ढिंगइ, बुढेबाढे आदमीसे सुरु होत हए पाएँ पूजन, लौडिया दमदाको पाँए पूजन एक बडो सम्मान हए ऐया दौवाके ताहीं । पाँए पूजके कोइ कोइ आदमी पानी उर्कत हएँ, हीना बहनुइया(जीजा) औ सालीकी थुरबहुत मजाक फिर चलत हए । पाँए पूजके गडुवाको पानी, डलबा, दूब, पाँए पुजी रुपैयाकी थरिया ७ ७ चोटी हलानको चलन हए । पाँए पूजनपेती दुलहा दुलहीनके लत्ताकी गाँठी बाँधोजात हए ।
१४. भिउरी फिरन ः पाँए पूजके भिउँरी फिरन चलन सायद सबए हिन्दुको परम्परा हए । बरमाला डारके, सिंदुरा डारके, उँगठी पैंधाएके, दुलहाके बहनुइया दुलहाके औ दुलहीनकी ललो, भौजी दुलहीनके पकडके धिरे धिरे ७ फेरा निगात हएँ । निगाइ दहिना से दिवरा पारके होत हए । अग्गु अग्गु दुलहा पिच्छु पिच्छु दुलहीनके निगानको चलन हए । जा चलनको सांकेतिक मान्यता हए की अब ७ जनम तक सम्बन्ध रहए । आजकल कहुँ कहँु लौंडियाके फिर अग्गु निगात हएँ जा एक महिलाबादी सोचाइको उपज हए । उनको मान्यता हए की हर काममे लौडा अपनी चलात हएँ त लौंडिया फिर चलाए सकत हएँ, तबही लौंडियाके फिर अग्गु निगान पडो ।

जूता लुकान, रुठन

दुलहीनके ब्याहन गओ दुलहा खानु खानपेती जूत्ता चप्पल खोलके रुसैयामे जात हए तओ दुलहाकी साली जूता लुकानको चलन हए । जूता लुकाएके कुछ दक्षिना मागत हएँ । खानु खानपेती पहिले पहिले दुलहा रुठानको चलन रहए ऐसे रुठके ससुरो से कुछ दक्षिना पानको आसरा होत रहए ।

भिटान

सबेसेके पहरमे दुलहाके भिटानको चलन हए । दुलहिन घरके आदमी गाओंमे घरघर बुलात हैं चलियो भिटान कहिके उनके नातेदार, निउतहर औ गाँवबाले जो नातेदार होत हैं कौनसे का नातेदारी हए बहे हिसाबसे दुलहा भेटत हए । नयाँ नातेदार से पहिलो चोटी दुलहासे औपचारिक रुपमे भेटनको चलनसे भिटान कहत हैं ।

दुलहा सम्हारन

दुलहीनके घर सबेरेके पहरमे दुलहाके बक साली सम्हारनको चलन हए । दुलहाके अलावा बहनुइयाके फिर सम्हारन चलन हए पर बहनुइयाके सम्हारन इच्छाकी बात हए ।

बराइत दावन

दुलहाके विदाइके बखत बाँसमे दुलहीनके भैया बैठजात हैं जा से बाँस दावन या बराइत दावन कहत हएँ, कुछ दक्षिना लैके इकल्लो बराइत उठान मिलत हए तओ दुलहाकी बिदाइ होत हए । आजकाल बराइत के बदला गाडी, जीप होत हएँ ता गाडीके अग्गु ठाडके, रोकनसे बराइत दावनको चलन पूरो करत हैं ।

पचहर

आए भए निउतहर दक्षिनाके रुपमे कुछ समान देत हैं औ घरसे फिर कुछ समान देत हैं जो समान दैजोके रुपमे होत हए बा से पचहर कहत हएँ । औ जातके हानी रानाथारु समाजमे पचहर (दैजो) मागनको चलन नैया जितका जुरात उतकएमे खुस रहन पडत हए । पचहरके रुपमे खानु खान पकानके समान भाँडा बर्तन, लोटा, गिलास, चून, चामर, नून, तेल जैसे समान जरुरी होत हएँ । लौंडियाके खानपीनको समस्या ना होबए कहिके जा देनको मान्यता हए । औ मगनीमे आओ भओ सन्दूखामे जे समान धरके पठात रहैं । आजकाल दराज, कुर्सी, पलङ तक देत हैं जौनके जुरात हए ।

डलबा बोकन

दुलहीनकी विदाइ संग डलबामे हरदहरी समान, दुलहीनके समान धरके बिदा करत हैं । डलबा दुलहीनके भैया बोकत हैं ।

अडाबडा

दुलहीनके लैके दुलहा गाँउ भितर छिरनसे पहिले डगरमे भर्रा पुजा करत हए बा पुजासे अडाबडा कहत हैै । जा पुजा खास कर्के घर भर्रा लोग करत हैं ।

द्वारो गेंसन

दुलहाके घरमे नइ दुलहीनके स्वागत कर्के दिउता भिटाएके दुलहा दुलहीनके कोलामे लैजात हैं बो बखत दुलहाके बहनुइया, औ दिदी बहिनीया घरमे डगर गेंसत हैं जो से द्वारो गेंसनको चलन कहत हएँ । गीत गातए डगर रोकके दुलहाके अइया दौवासे अपनो माग धरत हैं ।

सिट्कौरा खवान

रुसैयामे दुलहा दुलहीनके संगए बैठारके दुलहाकी बहिनीया औ भौज भात दुलहाके हातसे दुलहीनको हातमे धरबानको चलनसे सिट्कौरा खबान कहत हएँ । ५÷५ चोटी भात दुलहा दुलहीन एक दुसरेक हातमे धरत हएँ । सिट्कौरा खबाएके दुलहा अपने हितुवा से राम रमैया करत हए औ बटुवामे कुछ खानिया समान धरके मागन बारेक देत हए ।

डोली लुकान

सबेरेक पहरमे दुलहीनकी डोली लुकानको चलन हए । गाँवसे बाहीर दुलहीनकी संगीन ललो, भैया सहीत दुलहीनके डलबा औ समान लुकात हएँ । लुको भओ समान बहनुइया ढुँडन पडत हए । पात ना हएँ ता कुछ खान पीनके ताहीं कुछ पैसा देन पडजात हए । बहनुइया डोली ढूँडके लाएके घरमे दुलहीनके भिटानको चलन हए, गाँव बाले औ नातेदार, बहनुइया सबए दुलहीनके भिटात हएँ । कुछ पैसा, दक्षिना, कपडा जैसे समान दैके भिटात हएँ ।

गुल्टा

सबसे छोटो लौंडाके ब्याहमे गुल्टा उलानको चलन हए । दुलहाके दिदीबहिनीया, भतिया छानीमे चढके मिठा, समान फेंकत हएँ तरेबाले आदमी बो समान झपटत हएँ । गुल्टा उलाएके गीत फीर गात हैैं औ बरहामे दुलहासे कुछ दक्षिना बाँधनको माग करत हएँ ।

बधाइ

दुलहेरा बिदाइको दिन सबेरे खास ककें बाजा बजाएके नाचनपेती आसपरोसी, कुर्मा घरके अन्न डारत हएँ बा अन्नसे बधाइ कहत हैं । पिच्छु जा अन्न दिदी बहिनीयाको लागत हए ।

ढएहैया

घरे पुगनसे पहिले कुछ मिठाइ बाँटत हैं, दुलहीनको ब्याहमे जानबाले ढहैया बैयरनके पहिले पहिले चीर (कपडा) बाँटत रहैं पर आजकाल बो चीरको काम फिर नैया । पहिले बो चीर घंघरिया, अँगियामे लगात रहैं । ढहैया आदमी सन्झाको खानु ब्याह बारे घर खात हएँ ।

पानी भरन

भोर भए नइदुलहीनसे पानी भरबात हएँ दुलहीन पहिलो दिन ससुरारको नल चलात हए त पहिले कुछ चामरके दाना नलमे औ चारौ दिशामे डारत हैं । बो दिन नइ दुलहीन खानू पकात हए । गाउँभर हटकना करत हैं, हटकनामे दुलहीनसे घिउ डरबात हएँ । खानु खाएके कुछ दक्षिना देत हैं गाउँबाले, आजकल जा दिनसे पार्टी कहत हएँ, दुलहा दुलहीनके टीका लगात हएँ, आशिर्वाद देत हएँ ।

करबरेहा, भुजैन, डाँगिया(चाकर)

ब्याह भर जे आदमीको बहुत रोल रहत हए , करबरेहा आदमी पानी पिवान, प्रसाद बाँटन, बराइत बनान से लैके ब्याहको औ काममे सहयोग कर्त हैं। भुजैन खानु पकान, खबान औ काममे सहयोग करन । डाँगिया नल चलाएके पानी भरत हएँ औ गाँउमे निउतो बाँटन । जे सबको अपनो अपनो काम रहत हए जे दुसरे घरके पर अपनी गाँउके होत हएँ । सबएको सहयोगसे ब्याह निभट जात हए । ब्याहके बाद जे सबके कुछ रुपैया, अन्न देन पडत हए ।

रानाथारू भाषाकि उजियाराे पत्रिका मैसे सभार

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