धनगढी ।

सावन की हरियाली ने पूरे गाँव को अपनी चादर में ढँक लिया था। आसमान में काले बादल मंडरा रहे थे। खेतों में धान की रोपाई पूरी हो चुकी थी और किसान कुछ फुर्सत के पल बिता रहे थे। लेकिन राना थारू गाँवों में सावन के आगमन के साथ ही एक अलग ही रौनक शुरू हो चुकी थी। गाँव के चौपालों और खुले मैदानों में बड़े-बड़े लकड़ी के झूले खड़े किए जाने लगे थे।

सुबह होते ही भाई-बहन और गाँव के युवा जंगल की ओर निकल पड़ते। कोई लकड़ी काटता, कोई रस्सियाँ बनाता और कोई झूले तैयार करता। सबका एक ही उद्देश्य होता—सामन पर्व के लिए मजबूत और सुंदर झूले बनाना।

कुछ ही दिनों में मायके लौटी विवाहित बेटियाँ पूरे गाँव के वातावरण को और भी उल्लासमय बना देतीं। पारंपरिक राना थारू वेशभूषा, चाँदी के आभूषण और माँग में सजा सिंदूर धारण किए महिलाएँ झूले पर बैठकर सामन के मधुर लोकगीत गातीं। झूला जितना ऊँचा झूलता, गीतों की स्वर-लहरियाँ उतनी ही दूर तक फैल जातीं। हँसी, गीत और उत्साह से पूरा गाँव सावन के उत्सव में डूब जाता।

राना थारू समुदाय में सामन (तीज) केवल एक दिन का पर्व नहीं है। यह लगभग एक माह और तीन दिनों तक मनाया जाने वाला सांस्कृतिक उत्सव है। इस पूरे समय झूला झूलना, लोकगीत गाना, रिश्तेदारों से मिलना और पारिवारिक संबंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाना इस पर्व की प्रमुख परंपराएँ हैं। विशेष रूप से यह पर्व भाई-बहन के स्नेह और आत्मीयता को और गहरा करने वाला उत्सव माना जाता है।

सावन शुक्ल तृतीया का दिन इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। इस दिन महिलाएँ निर्जला एवं निराहार व्रत रखती हैं। उनका यह व्रत पति की दीर्घायु के लिए नहीं, बल्कि अपने भाइयों और भतीजों के लंबे जीवन, सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और सुरक्षा की कामना के लिए होता है। दिनभर उपवास रखने के बाद वे सिमही, गुलगुला, पूरी जैसे पारंपरिक व्यंजनों से अपना व्रत खोलने की तैयारी करती हैं।

संध्या होने पर व्रत रखने वाली महिलाएँ नदी के तट की ओर जाती हैं। उनके हाथों में गडरौरा घास अथवा कुश होती है। विवाहित महिलाएँ उसमें सात गाँठें और अविवाहित युवतियाँ पाँच गाँठें बाँधती हैं। प्रत्येक गाँठ बाँधते समय वे अपने भाइयों और भतीजों का स्मरण कर उनकी दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं।

पूजा पूर्ण होने के बाद एक अत्यंत रोचक परंपरा निभाई जाती है। महिलाएँ चाँदी के आभूषण या सिक्के से उन गाँठों को काटती हैं और उन्हें नदी में प्रवाहित कर देती हैं। नदी की धारा के साथ गाँठों के बहते ही उनके हृदय में केवल एक ही प्रार्थना गूँजती है—

“जैसे नदी का प्रवाह निरंतर आगे बढ़ता रहता है, वैसे ही मेरे भाइयों और भतीजों की आयु, उन्नति और समृद्धि भी निरंतर बढ़ती रहे।”

नदी उस प्रार्थना को अपने साथ बहाकर प्रकृति को उसकी साक्षी बना देती है।

गाँठों के विसर्जन के बाद महिलाएँ अपने साथ लाया हुआ प्रसाद ग्रहण कर व्रत समाप्त करती हैं। लेकिन उत्सव का आनंद यहीं समाप्त नहीं होता। घर लौटते समय भाई और भतीजे रास्ता रोककर खड़े रहते हैं। उनके हाथों में कुश अथवा वाइबो से बनी एक पारंपरिक पट्टी (पटाकी) होती है। वे हँसी-मज़ाक करते हुए उससे अपनी बहनों को हल्के से स्पर्श करते हैं और प्रसाद माँगते हैं। बहनें मुस्कुराते हुए उन्हें प्रसाद देती हैं। इस प्रकार प्रेम, अपनापन और हास-परिहास के साथ भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का उत्सव मनाया जाता है।

इस पर्व से जुड़ी एक रोचक लोककथा भी राना थारू समुदाय में पीढ़ियों से सुनाई जाती रही है।

बहुत समय पहले बेहमैया नामक एक वृद्धा ने अपने भाइयों और भतीजों की दीर्घायु की कामना करते हुए तीज का व्रत रखा। पूजा के बाद उन्होंने गडरौरा घास में गाँठें बाँधीं और उन्हें नदी में प्रवाहित करने लगीं। जब गाँठें नहीं बहीं, तो वे चिंता में रोने लगीं। कुछ देर बाद जैसे ही गाँठें नदी की धारा में बहने लगीं, उनके चेहरे पर प्रसन्नता लौट आई।

उसी समय भगवान गैरा (शिव) और माता पार्वती पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे थे। उन्होंने वृद्धा को कभी रोते और कभी मुस्कुराते देखा तो कारण पूछा। बेहमैया ने श्रद्धापूर्वक उत्तर दिया—
“हमारे समुदाय में यह विश्वास है कि यदि गाँठें नदी में बह जाएँ तो भाइयों और भतीजों की आयु बढ़ती है, और यदि न बहें तो अनिष्ट की आशंका रहती है।”

वृद्धा की अटूट आस्था और निस्वार्थ प्रेम से भगवान शिव और माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने इसी विधि से व्रत करने, गाँठें बाँधकर नदी में प्रवाहित करने तथा भाइयों की दीर्घायु की कामना करने का आशीर्वाद दिया। जनश्रुति के अनुसार तभी से राना थारू समुदाय में यह परंपरा निरंतर चली आ रही है।

एक अन्य लोकविश्वास इस पर्व के महत्व को और भी स्पष्ट करता है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में महामारी और विभिन्न रोगों के कारण समुदाय में पुरुषों की मृत्यु-दर बढ़ गई थी। तब महिलाओं ने अपने भाइयों और भतीजों के जीवन, सुरक्षा, दीर्घायु, सुख और समृद्धि की कामना करते हुए इस व्रत की शुरुआत की।

आज समय बदल गया है, जीवनशैली भी बदल चुकी है, लेकिन राना थारू समुदाय में सामन पर्व की मौलिकता आज भी अक्षुण्ण बनी हुई है। झूले की हर उड़ान से स्मृतियाँ जुड़ी हैं, सामन के प्रत्येक लोकगीत में संस्कृति की सुगंध बसती है, और नदी में प्रवाहित की जाने वाली हर गाँठ में भाइयों के प्रति अपार स्नेह, शुभकामनाएँ और मंगलकामनाएँ समाहित रहती हैं।

जहाँ अन्य समुदायों में तीज का पर्व मुख्यतः पति की दीर्घायु की कामना के साथ मनाया जाता है, वहीं राना थारू समुदाय में यह पर्व भाइयों और भतीजों के सुख, समृद्धि, सुरक्षा और दीर्घायु की कामना को समर्पित है। यही इसकी सबसे विशिष्ट पहचान है। सामन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भाई-बहन के प्रेम, सम्मान, एकता और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने वाली एक जीवंत परंपरा है।

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