धनगढी, पहिचान बोकि भाष संस्कार, संस्कृति, परम्परा, रीतिरिवाज हरेक जाति और समुदायकि, धर्म, विश्वास और जीवनपद्धतिसँग जुडो होत हए । जे पक्ष कोइ समुदायके अलग्गए चिनारी इकल्लो ना देत हएँ, पुस्तौँसे हस्तान्तरण होतए आओ सामूहिक इतिहास और स्मृतिके फिर जीवित धरत हएँ । तभि कोइ समुदाय मनानवालो पर्व केवल मनोरञ्जन या धार्मिक अनुष्ठानके रुपमे बुझन पर्याप्त ना होत हए । बाके पच्छु रहो विश्वास, सामाजिक सम्बन्ध, लोकज्ञान, पारिवारिक मूल्य और सामुदायिक व्यवहारके फिर बुझन आवश्यक होत हए ।
नेपालकि सांस्कृतिक विविधता भितर रानाथारु समुदायकि अपनिए विशिष्ट स्थान हए । रानाथारु समुदायमे होरी, खख्डेहरा, चराइँ, तिज, बिनाइतबारी, दिबारी लगायत तमान् पर्व प्रचलित हएँ । जे मैसे अट्टमी पर्व विशेष धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक अर्थ बोके पर्वकि रुपमे दिखात हएँ । रानाथारु भाषामे श्रीकृष्ण जन्माष्टमीके ‘अट्टमी’ और श्रीकृष्णके ‘कान्हा’ कहत हएँ । अष्टमी तिथिमे श्रीकृष्णकि जन्म भओ धार्मिक विश्वासकि आधारमे मनानवालो जा पर्व रानाथारु समुदायमे अपनिए मौलिक विधि, लोकविश्वास, गीत, नृत्य और सामुदयिक सहभागिता सहित मनाओ जात हए ।


पर अट्टमीके केवल ‘कृष्ण जन्माष्टमी मनान और ब्रत बैठन दिन’ कहिके सीमित करन जाको वास्तविक सांस्कृतिक गहिराइके ना बुझन हए । अट्टमी पर्वसँग संस्कार फिर हए काहेकि जासे आदमिन्को व्यक्तिगत आस्था इकल्लो ना हए । परिवार, सन्तान, स्वास्थ्य, सामाजिक सम्बन्ध, पुर्खाकि विश्वास, सामुदायिक सहयोग और जीवनचक्रसँग सम्बन्धित मूल्यन्के फिर अभिव्यक्त करत हए ।


अट्टमीकि धार्मिक विश्वास और मनौतिकि संस्कार
अट्टमीकि मूल आधार श्रीकृष्ण जनम सम्बन्धी धार्मिक विश्वास हए । धार्मिक मान्यता अनुसार भादौँ महिनाकि कृष्णपक्ष अष्टमीकि आधिरातमे देवकीकि आठौँ सन्तानकि रुपमे कृष्णकि जन्म भओ रहए । कंसकि अत्याचारसे संसारके मुक्त करन भगवानकि रुपमे श्रद्धा करो जात हए ।
रानाथारु समुदायमे जहे धार्मिक कथाके स्थानीय लोकविश्वासँग विशेष सम्बन्ध बनाओ दिखात हए । विशेषकरके सन्ता प्राप्तिकि इच्छा भए या लम्बो समयसे रोगव्याधिसे पीडित आदमि अट्टमीकि व्रत बैठन परम्परा रहो मिलत हए । जा अर्थमे अट्टमीकि व्रत केवल उपवास ना हए, मनौती और आशाकि संस्कार हए ।


‘हे भगवान्, हमर घरमे कान्हाकि रुपमे आए जा’ कहनिया भावसे व्रत बैठन कहोक मनइ अपन दुःख, इच्छा और आशाके धार्मिक विश्वासँग जोडन हए । जामे सन्तानउपरको चाहना, परिवारकि सुख, स्वास्थ्य और दुःखसे मुक्ति पान आकांक्षा अभिव्यक्त होत हए । तभि अट्टमीकि व्रतके रानाथारु समाजकि आस्था, आशा और मनौतीकि लोक परम्पराकि रुपमे फिर बुझन सकत हएँ । पहिले विशेष दुःखमे पडे आदमि इकल्लो ऐसो व्रत बैठत सामाजिक स्मृति मिलत हए । अभए कहेसे धार्मिक आस्था, पारिवारिक परम्परा या व्यक्तिगत इच्छाकि कारण तमान् आदमि व्रत बैठन लगे हएँ । जासे संस्कार समयसँग परिवर्तन होतए जानिया सामाजिक प्रक्रिया फिर दिखात हए ।


तयारीसे हि सुरु होत हए संस्कार
अट्टमी पर्वकि सांस्कृतिक विशेषता जाकि मुख्य पूजा या व्रतमे सीमित ना हए । पर्व आनसे कुछ दिन अग्गुएसे घर और गांवमे तयारी सुरु होत हए । घरकि सरसफाइ, लेसनो, पडोर्नो, चौका लगानो, प्रसाद बनान, पूजा सामग्रीकि तयारी, बाजागाजाकि व्यवस्था आदिसे पर्वके सामुहिक वातावरण मिलत हए ।


घर सफा करन कहोक केवल भौतिक सरसफाइ इकल्लो ना हए, धार्मिक दृष्टिसे घरके पवित्र बनान काम फिर हए । जासे आदमिके बाहेरसे इकल्लो नाए भितरसे और मानसिक रुपसे पर्वकि ताहिँ तयार होनको अवस्था सिर्जना होत हए ।
बइयर घर पडोरन, चौका लगान, प्रसाद बनान और पूजा तयारीमे सहभागी होन, लाँैडिया और गांवके औ आदमि गीत, नाच और बाजागाजाकि तयारीमे जुटन परम्परासे समुदायके सबए पुस्तान्के जोडन माध्यम बनत हए ।
विशेषकरके खजुरिया बनान परम्परा अट्टमीकि मिठाइसँग जुडो महत्वपूर्ण पक्ष हए । गेहुँकि चून और चिनिसे तयार करनिया खजुरिया केवल खानवालो इकल्लो ना हए, भगवान्के चढानवालो नैवेद्य और समुदायमे बाँडनवालो प्रसाद फिर हए । जासे स्थानीय खाद्यज्ञान, घरेलु सीप और धार्मिक आस्थाके एकए परम्परामे जोडत हए ।


डोला ः धार्मिक प्रतीक और लोककलाकि अभिव्यक्ति
अट्टमीकि दुसरो महत्वपूर्ण पक्ष हए, कन्हइयाकि डोला । आमकि कठियासे निक्कना बडो पलङ, बामे खिरा या कृष्णकि मुर्ति, सेतो कपडा और आसपास या भितिमे बनानवाले जिवजन्तुकि चित्रन्से अट्टमीके विशिष्ट लोककलासँग जोडत हए ।
डोलामे फुला लगो खिराके कान्हाकि प्रतीककि रुपमे स्थापना करन चलनसे स्थानीय प्राकृतिक वस्तुके धार्मिक प्रतीकमे रुपान्तरण करो देखो जात हए । जामे प्रकृति, कृषि और धर्मबिचकि सम्बन्ध फिर दिखात हए । डोला धरनिया प्रक्रियासे रानाथारु समुदायकि परम्परागत हस्तकला, स्थानीय सामग्रीकि प्रयोग और धार्मिक कल्पनाशक्तिके फिर संरक्षण करो गओ हए । आज आधुनिक बजारसे तयार भओ डोला या अन्य सामग्रीकि प्रयोग करन चलन बढत जाएसे फिर पुरानो डोला बनान परम्परा समुदायकि मौलिक सांस्कृतिक ज्ञान बोके हए ।
जहेकमारे डोला केवल भगवान् धरनिया स्थान ना हए, धार्मिक प्रतीक, लोककला, हस्तकला और सांस्कृतिक स्मृतिकि संगम हए ।


हवन और व्रत
अट्टमीमे हवनकि विशेष महत्व हए । आमकि कठिया, हवन सामग्री, घ्यु और धुप आदिकि प्रयोग करके करनिया हवन धार्मिक शुद्धिकरण और भगवानप्रतिकि श्रद्धासँग सम्बन्धित हए ।


विशेष करके पहिलो पटक व्रत बैठनवालो आदमि अग्गुएको वर्षसे जा परम्परा पालना करन घरमे जाएके हवनमे सहभागी होन और भगवानसँग अपन मनोकामना धरन चलन अट्टमी संस्कारकि एक महत्वपूर्ण पक्ष दिखात हए । जासे नया पुस्ता या नया व्रतालु पुरानो पुस्तासे संस्कार सिखन अवसर पात हएँ ।


ऐसे देखत पेति अट्टमी पुस्तान्तरण होनिया संस्कार फिर हए । संस्कार पुस्तक पढके इकल्लो ना सिखो जात हए । दादोदादी, अइयादउवा और समुदायकि अग्रजसँग बैठके, पूजा देखके, गीत सुन्के और अनुष्ठानमे सहभागी हुइके सिखो जात हए ।


आधिरात और व्रत खोलन परम्परा
अट्टमीकि भावनात्मक केन्द्र भगवान कान्हाकि जनमसँग जुडो आधिरातकि समय हए । दिनभर व्रत बैठके रातके हवन, पूजा और प्रसाद चढाएके कृष्ण जनमकि प्रतीक्षा करो जात हए । जनमपच्छु व्रत खोलन परम्परा धार्मिक कथाके व्यवहारिक संस्कारमे रुपान्तरण करो दिखात हए । फलफूल, खजुरिया और दूधसे बने परिकार प्रसादके रुपमे ग्रहण करो जात हए । बा दिन नुन ना खान चलन फिर व्रतकि अनुशासनसँग सम्बन्धित हए ।


जा प्रक्रियासे संयम, धैर्य, श्रद्धा और अनुशासन जैसे मूल्यन्के सांस्कृतिक रुपमे अभ्यास करात हए । व्रत केवल भुखो बैठन ना हए, अपनए करो गओ कसमके पूरा करन अभ्यास फिर हए ।


अट्टमीकि लोकगीत और नृत्य
अट्टमी पर्वकि सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पक्षमैसे लोकगीत, कीर्तन, रामायण वाचन, ठाडिया नाच, बैठक्की गीत और जाग्राम हएँ । सिमरौनी, गुपली, गुर्भौती, जल्मौती, भिनसरियालगायतके गीतसे धार्मिक कथाके स्थानीय लोकभाषा और लोकशैलीमे अभिव्यक्त करत हएँ ।
जे गीतन्के केवल मनोरञ्जनकि साधनकि रुपमे देखन उचित ना हए । लिखित इतिहासकि पहुँच सीमित भओ समयमे ऐसे लोकगीत और लोकगाथासे समुदायकि धार्मिक विश्वास, सामाजिक जीवन और पुर्खाकि अनुभवन्के पुस्तौँसम बोक्के आए होत हएँ ।
विशेषकरके कान्हाकि जनम, देवकी, जमुना और कृष्णसँग सम्बन्धित गीतन्से धार्मिक आख्यानके रानाथारु समुदायकि अपनिए सांस्कृतिक परिवेशमे प्रस्तुत करत हएँ । तभि अट्टमीके लोकगीत समुदायकि मौखिक अभिलेख फिर हएँ ।
रातभर जाग्राम बैठके, घर–घरमे गीत गान और नाचन परम्परासे गांवके आदमिबीचको सम्बन्धके औरु तगडो बनात हए । जासे पर्वके व्यक्तिगत पूजासे सामुदायिक उत्सवमे रुपान्तरण होत हए ।


अट्टमीके कुछ गीत
सिमरौनी गीतः
सिमरे सिमरे गुन गैयो मेरे राम ।
कौनएँ गीत गाबो रे सुन लैया उतार ।।
गुपली गीतः
शंकर पिता गरवसी माता सकल लोक परिवार ।
सबए देब जुरमतओँ करत हएँ चलहुन हरि के द्वार ।।
गर्भौती गीत ः
कौन लोक से जा आओ बँभना कौन लोक के जाए ।
बाँभनको भेष से नारायण बनी जाए ।।
कन्हैयाको जल्मौती गीत ः
पनिया भरन के देबकी निकरी जमुना जी के तीर ।
भर भादौँ कि जा बिस अँधियारो कन्हैया ल्े औतार ।।
भिनसरिया गीत ः
भेन भई भिनसरिया पछार भई रात, उठोन बारो कान्हा बछरा चरान ।।


स्रोत ः बम्मन राना,
कुस्ती, नाच और सामुदायिक प्रतिस्पर्धा
अट्टमीकि दुसरो रोचक पक्ष कुस्ती और लौँडनको ठाडिया नाच औरु बइयरन्को बैठक्की गीत हए । कुस्तीमे अपन शक्ति और सीप प्रदर्शन करन परम्परा मनोरञ्जनसँगए सामुदायिक सहभागिताके बढावा देत हए । ऐसे गतिविधिमे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा, साहस और शारीरिक दक्षताकि प्रदर्शन होत हए । ऐसिए नाच और गीत समुदायके सदस्यन्के एकए सांस्कृतिक वातावरणमे सहभागी करबात हए । जासे अट्टमीमे धर्मसँगए मनोरञ्जन, कला, खेलकुद और सामाजिक सम्बन्ध फिर जुडो स्पष्ट होत हए ।


दुसरो दिन
अट्टमीकि दुसरो दिन औरु जाधा संस्कारगत महत्व बोके दिखात हए । हवनकि भुवा और पूजा सामग्री विसर्जन करन चलन अत्यन्त अर्थपूर्ण हए । जासे संस्कारमे संकल्प और त्याग दुनेको स्थान हए दिखात हए ।


ऐसि करके एकए परिवारमे एक आदमि व्रत छोडत हए तओ दुसरो आदमि लेनको प्रक्रिया संस्कारके निरन्तरता और हस्तान्तरणको सुन्दर उदाहरण हए । जासे व्रत के आदमिकि निजी अभ्याससे फिर उपर उठके पारिवारिक संस्कार बनो दिखात हए ।


कुश, पेरो पानी और घर–घरको सम्बन्ध
दुसरो दिन बालका खेतसे कुश लात हएँ, दूध और हर्दि मिलाएके पेरो पानीसे घर और परिवारके पवित्र करत हएँ । ऐसि करके बालका लोग गांवके सबए घर–घरमे जाएके घरमालिककि टाँग धोन, दिउतामे बहे पेरो पानी छिरकनको परम्परा फिर सामाजिक पक्ष हए । जामे बालकन्को सहभागिता विशेष अर्थपूर्ण हए । बे केवल पर्व देखत ना हए, संस्कारमे सक्रिय सहभागी होत हएँ । ऐसे बच्चा व्यवहारएमे अपन समुदायकि संस्कृति सिखत हएँ । घर–घरमे पुगके आशीर्वाद लेन और दान–दक्षिणा लेन चलनसे गांवके परिवारबीचकि सम्बन्धके नवीकरण करत हए । रोगव्याधा घरमे प्रवेश ना करन कहनिया जनविश्वाससे जाके स्वास्थ्य, पवित्रता और सुरक्षासँग जोडत हए । ऐसे अट्टमी आदमि–परिवार–पडोसि–समुदायके जोडन सामाजिक पुलकि काम करत हए ।


सठी ः कन्हैयाकि जनमके जीवनचक्रकि संस्कारसँग जोडनको परम्परा

अट्टमीकि दुसरो दिन साँझके सठी करो जात हए । जाको विशिष्ट सांस्कृतिक पहिचान हए । रानाथारु समाजमे बच्चा जन्मत हए, गोँडी छुटत हए तओ सठी करो जात हए । जहे जीवनचक्रसँग सम्बन्धित संस्कारके कृष्ण जनमसँग जोड्के मनानो कारण अट्टमीमे सठीकि विशेष महत्व हए । जा एक गहिरो संस्कृतिक अर्थ बोके हए । कन्हैयाकि जनमके केवल धार्मिक घटना नाए, नया जीवनकि आगमनकि रुपमे ग्रहण करन हए ।
डोलासहित अट्टमी मनानिया परिवारमे सठी अनिवार्य जैसो मनानो और गांवभरके आदमिन्के खानु खान बुलानको चलनसे जनम, परिवार और समुदायबीचकि सम्बन्धके उजागर करत हए ।


अट्टमी पर्वकि अध्ययन करत पेति एक महत्वपूर्ण बात दिखात हए—जामे धार्मिक तत्व बाह्य धार्मिक परम्परासे इकल्लो ना आओ हए, रानाथारु समुदाय जाके अपनिए स्थानीय जीवनशैली, भाषा, लोकगीत, खानपान, कला और सामाजिक सम्बन्धसँग जोड्के अपनिए सांस्कृतिक रुप दै हए ।
‘कृष्ण’ के कान्हा या कन्हैया कहिके बुलान, जन्माष्टमीके ‘अट्टमी’ कहनो, डोलामे खिराके कान्हाकि प्रतिक बनान, स्थानीय खजुरिया चढान और गुलगुला चढान, अपनिए लोकगीत गान, ठाडिया नाच और बैठकि गीत प्रस्तुत करन, जे सब धार्मिक पर्वके रानाथारु सांस्कृतिक स्वरुप प्रदान करे हएँ । तभि अट्टमीके केवल कृष्ण जन्माष्टमीकि स्थानीय रुप कहिके बुझन फिर अपूर्ण हुइहए । जा रानाथारु समुदाय धार्मिक विश्वासके अपन सामाजिक और सांस्कृतिक जीवनसँग जोडके विकसित करो गओ जीवित सांस्कृतिक परम्परा हए ।

सेयर कर दियो ।