का हए टिडिदल? जो आए रहे हएँ जिन्से कैसे बचसकत हएँ?

का हए टिडिदल? जो आए रहे हएँ जिन्से कैसे बचसकत हएँ?

धनगढी,१५ जेठ । टिडिदल शब्द हमर समुदायमे लगभग सबय सुने होमङ्गे पर देखे मनै साइत कुइ होबए । बुढेपाखे पुर्खाकि कहाइ अनुसार अँखफुट्टा टिंढा हानी किरा एकमुष्ट आएके खेतिपाती, रुखबरिख खाएके सोहा कर्जात हएँ औ भुँखन मरन अवस्था कर्जात हएँ । (टिंढाको दल(समुह))के मारे हमर पुर्खा जिन्से टिडिदल नाओ से पहिचानत हएँ पर जा किरासे सलह (Locust) कहत हएँ। मानव समुदायके ताहिं जा बहुतए उर्हान करन बालो प्रजाती को किरा हए । खासमे खेतिपातीके ताहिँ जे टिडिदल सब्से उर्हानी हएँ । जिनको बडो दल लगभग ३५०००जनिको खानिया एकए दिनमे खाजात हएँ ।९० बर्ष पहिले बि.सं. १९८५-१९८६ घेन अफ्रिका मरुभूमि घेनसे अँधाकुप्प कर्के बदरी हानी आएभए टिडिदल खासमे तराई क्षेत्रमे बहुत नुक्सान करि रहएँ । ऐसिए मल्लकालमे फिर नेपालमे टिडिदल नुक्सान कर्के भुँखा पडो इतिहास हए । जे एक दल(झुँड)मे करोडौं को संख्यामे रहत हएँ औ एकए दिनमे १५० कि.मि तक यात्रा कर्त हएँ । जिनको जीवन चक्र ३-६ महिना तक होत हए । जे गजब बच्चा पैदा करत हएँ एक बैयर प्रजातिक इकल्लो किरा ३ महिना भितर लगभग २००-२५० अन्डा डारत हए । अगर जहाँ जे पुग्गए हुना सब हरियाली सोहा कर्जात हएँ । त्रिभुवन बिश्वबिद्धालयके प्राणी शास्त्र बिभाग के प्राध्यापक प्रेमबहादुर बुढाकि कहाइ अनुसार जिनको ठिहा अनुसार प्ररकृती अलग होत हए पर जहाँ जे पुगे हुना सब नस्टए हए भुँखमरी होत हए । जे किरा २७-४० डिग्री तापक्रम मे दिनके औ जस अगरो तत्तोमे रातके दुसरे जगहा जात हएँ।अभे पुर्बी अफ़्रिका से सुरु भए टिडिदल पाकिस्तान होतए भारतको राजस्थान तक पुगियाए हएँ । अभे भारतमे लगभग ३ बर्गकिमी तक एकमुष्ट फैले टिडिदल राजस्थान, उत्तर प्रदेश औ मध्यप्रदेश मे खेतिपाती नस्ट कर रहे खबर भारतिय सञ्चारमाध्यम मे आएरहिं हएँ । अभे राजस्थान घेनको सलह दिल्ली घेन आएरहो फिर जानकारी मिलो हए दिल्लिमे सतर्कताको संदेश फैलाओ गओ हए । भारतमे लगभग ५लाख हेक्टर क्षेत्रमे खेती नुक्सान कर्डारी जानकारी आइ हए । टिडिदल सुख्खा ठाउँमे जद्धा फैलत हएँ । हमर परोसी देश तक आइगए हएँ टिडिदल तभिमारे नेपाल मे ना आमङ्गे कोइ ना कहिसकत हए पर मनसुन जा टिडिदलसे बचाए सकत हए ।

टिडिदलसे बचन ताहिं कुछ तरिकापहिले पहिले बिसादी, किटनासक दबाइ ना रहए तओ अपने भाँडा बर्तन ठटाएके हल्ला कर्के टिडिदल भजात रहएँ पर बे मान्त ना रहएँ अपन मनको खाएके जात रहएँ । पर जे टिडिदल जद्धा बिच्चाले फैले होत हएँ तभी संसारमे आइपिएम तरिका ढुँडत हएँ पर तुरन्तए रोकन ताहिं बिसादिए ठिक मानोगओ हए । अफृकी देश्मे बडि मसिन, कुइ त जहाज से बिसादी छिंचत हएँ अभे केन्या २०जहाज दबाइ छिँचन ताहिं तयारी कर रहो हए । सोमालियामे रास्टृय संकट घोसणा करडारी हए । अभे दुनियाँमे जिन्से वचन ताहिँ मालाथियन, फेनिट्रोथियन नाओकी बिसादी छिंचत हएँ । अफ़्रिकि देशमे पुर्बानुमान कर्के गिनेचुने किरा दिखानए मे अग्गुस दबाइ डार्के रोकत हएँ ।भारतमे locust warning and control system गठन कर्के रोकन प्रयास हुइरहो हए अब नेपालमे हम ऐसे कर्सक्त हएँ टिडिदल से बचन ताहिं ।१) हमर परोसी देश भारत मे कैसे, कितए मुहके फैलरहो हए बक ट्र्याकिङ करन पडो नेपाल सरकार औ संबंधित निकाय ।२) जा किराके बारेम ब्यनस्थापनकि पुर्ब तयारी स्वरुप छलफल औ विधि पता लगान पडो।३)जैबिक बारको सम्भाब्यता ढुंडन पडो४) सरकार, कृषि अनुसन्धान औ सम्बन्धित गैरसरकारी संस्था लगायत सबय सरोकारवाला मिलके सहकार्यमे बिग्य टिम बनाएक अल्पकालीन औ दीर्घकालीन योजना बनान पडो ।टिडिदल रोकन कोइ निजि आदमी, इकल्लोक बसकी बात नैया जकताहिं पुरो सरकारके अग्गुस सानधान होन जरुरी हए अभे नेपाल सरकार्मे स्थानीय तह फिर बहुत तम्तयार रहन पडो, हमर परोसि देशमे राजस्थान घेनसे इतै मुहके आएरहेक मारे तराइके कंचनपुर औ कैलालीमे सब्से जद्धा जोखिम हुइसकत हए ।(जा लेख कृषि तथा बन बिज्ञान बिश्वबिध्यालयके सहप्राध्यापक औ उपप्रध्यापक डा. सुन्दर तिवारी / अनन्त प्रकाश सुबेदीको बिचारसे लए हएँ)

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