“ठाडीया नाँच” इतिहाँस

“ठाडीया नाँच” इतिहाँस

धनगढी, ६ बैशाख २०७६।

जेठको महिना रहए घामुगजब लागत रहए । साँझके खानु खाएके दादो नतिया एकय खटियामे लेटे दादो और नतिया बातकात रहँए ।
नतिय : दादो दादो बो तारा नेगत हए ।
दादो : अहँ रे ।
नतिया : जे तारा नेगके कहँचले जात हुइहँए दादो ।
दादो : आदमी मरत हँए तव जउन तरीजात हँए बे तारा बनत हँए और जौन आदमी नातरत हँए तव बे भुत बनजात हँए ।
नतिया : दादो आपनको कुरमा मैको दादो मरिगाओ तव अब बो तारा बनगओ हुइहाए हने दादो ।
दादो : हँ , बनिगओ हुइहाए । तव हि पडोसिक घर घेना मदरक अवाज आइ , बम बम बोमक बोमक
नतिय : चहुक पडो, हाय दादो खाएडारी ! का बाजो ।
दादो : देखत कित्तो जोरसे चहुक पडो । कछुनइयाँ परोसिक घरमे मदरा बजो हए । मगनी आइगइ हँए तहिक मारे मदारी सजन धरन ताँही हुइहाए ।
नतिय : दादो नाच कहे खेलत हँए । गितउत कछुना समझमे आत हए । किल्लारी मारत हँए । तय समख लेत हँए ।
दादो : अहँ ! समख लेत हौ नैका हमर जमानामे त गाँवमे छ । सात नाँच होत रहँए ।
नतिया : तय गित जानत हए रे दादो ।
दादो : थोरी थोरी जानत हौ । मय सब भुलगौ रे बहुत दिन हुइगओ हए ।
नतिय : कैसे गात हँए ददो । मय त ऐकुनासमख पतहँओ । किल्लारी इकल्लो मारत सुनत हौँ ।
दादो : बखत बखत कि गित गात हँए ।
नतिया : ददो नाँच कहे खेलत हँए ?
दादो : बडलम्बी कहानि हए । अब रात हुइगइ हए । कल सुनामंगो । अब सोमय अपन
नतिया : नाँय नाँय ! मिरनिध नालागत हए । सुना दादो मय सुनंगो
दादो : तव हुकरा भरीए , तव त मय बतकामंगो नत मय नाबतकामंगो ?
नतिया : अहँ रे ! दादो
दादो : ले तव सुन !
वहुत पहिले ( तेर्ता युग ) की बात हए । एक दिन हनुमान के गजब जोर से भुखलागि और बो अपन ऐयासे खानुमागय । ऐयाक कामसे फुर्सद नारहए ।
नतिया : तव बो रोन लागो होबैगो हने रे दादो ।
दादो : हाँ जसै तय रोन लागत हए ।
नतिय : तओ !
दादो : अन्जनीक कोखसे जन्मो भौ हनुुमान जव अफ्नी ऐया से खानीचिज मागी तव वुक ऐया कही की रे भइया सवेरे–सवेरे लाल वेर हानी हुइहय वेहक खाईलिय । तव हनुमान ऐया कही उसिकरी ।
नतिया : हा हा हा गलम से खाइगओ हने । तओ खिर का भओ ।
दादो : हाँ रे जव सवेरे दिन निकरो तब हनुमान सोची साइत ऐया जेहक खान कही हुइकए । वो निकरो भौ दिनके खाइ दइ तवहि से हानुमानके मुह फुलो और कछु खाइरहो जैसे दिखात हए । वहे दिन से संसार अँधियारो हुइगओ ।
नतिया : तओ खिर का भओ
दादो : तव सृष्टिको अइसो अवस्था देखके सव देवता चिन्तित हुइके विष्णु भागवान ठिन गए और सृष्टिक समस्यक वरेम वतान लागे । तव विष्णु भगवान कही अब चिन्ता मतलेवओ मिर सल्लहा अनुसार तुम सव मृतुलोकमे जएके नाच करियो ।
नातिया : झकनक झकनक पोमक पोमक करन लागे हुइहँए हने दादो
दादो : भगवाकि सल्लहा अनुसार सव देवता भिलके मृतुलोकमे नाच करन लागे । जा नाच देखके हनुमान जी नाहाँसी । तव विष्णु भगवा स्वंम अपनय नाचमे जएके सोङ्ग बन्नके दिखान लागे तव विष्णु भगवाक सोङ्ग देखके हनुमान जी हस्पडे और हनुमानको मुहसे दिन निकरके बादरमे गाइभओ और संसार फिरसे उजियारो हुइगओ तवहिसे हमर रानाथारु समाजमे दुःख सुख और मनोरञ्जन के रुपमे खेलो जात है । जैसकी दुःख कहोक घाडा खुख कहोक मगनी और मनोरञ्जन कहोक कृष्ण जन्म अष्टमी मे जा नाच मुख्य रुपमे खेलत है और दिन फिर खेल सकत हँए ।
नतिया : दादो दादो कित्तो आदमी खेलत नाँच ?
दादो : नाँचमे लगभग १०–१२ आदमी तक होत है छय (६) आदमी गित और लोहम झौज वजात हँउ एक आदमी नाचत हँए और एक आदमी मदरा बजात हँए बँकी आदमी गाउ घरमे घाटो घटनके वरेम सोङ्ग निकारत हँए । अव से नाचमे सोङ्ग निकारनके चलन (संस्कृति) लगभग हराए गओ हए ।
नतिया : घुर…घुर ……..र
दादो : का सोयगओ रे नतिया , बहु लैजा जा नतियाक सेयगओ हए ।

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