“गुञ्ज ” कबिता

“गुञ्ज ” कबिता

लेखक :अनिता राना

धनगढी ,२० भादाै ।
गुञ्ज मोसे दुर कभी मत हुइँयो ।
और जब मिर याद आवए तओ बुलाइयो ।।
तुम मिर आँखीकी तस्वीर हओ ।
और तुमही मिर जिंदगीकी गीत हओ ।।


मएँ जब रुठ जाओ तओ मोके मनाइयो ।
और अपनी प्रितिकी गीत सुनइयो ।।
आपनकी प्रिति देखके दुनियाँ हँस्त हए ।
पतानए कितनो गुञ्ज आपनके देखके मरत हएँ ।।


दुनियाँकी बात लइके मोके मत भुलादियो ।
आपन कसम खाए हए बआ बचा निभादिओ ।।
आपनकी प्रिति देखके दिनियाँ ठक्रात ठुकरानदेओ ।
अपनी मर्जिसे प्रिति जोडे हएँ तओ बदा निभानदेओ ।।


जब तुमे कछु होत हए तओ मिर दिल रोतहए ।
और जब तुमे कछु मिलत हँस्त तओ मोके खुशिहोत हए ।।
गुञ्ज नरहाइगे तुम न मएँ , रहाइगी आपनी प्रिति ।
चलो इतिहासमे लिख देमएँ सारी प्रितिकी रीति ।।

सेयर कर दियो ।

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