“कुटनहारि” रानाथारू भाषामा कबिता

“कुटनहारि” रानाथारू भाषामा कबिता

बासमति राना ( शिक्षक )

धनगढी,१८ फागुन ।

कुटना पिसना जो पाइ कुटनहारि
हौँसक मारे अपनो सुपो समहारि ।।
मुर्गा बाङग जब उठके चलिविचारि
मुठी पसरके ताँहि बो हात पसारि ।।
पेटक चुगक ताँहिँ बो पिरानि तजि
भुँकि अधुखि पर बो अपनए रँजि ।।
हात , पहुँचा खियाइ रोज घना कुटि
हालि ना आइ कहुँ खुइँधनिया रुठि ।।
कुटना पिसनासे मुठी पसर झारि
बारे बारे लरकनको बो पेट भरि ।।
खुदिखण्डा कुटौनिसे घर बार चलो
रुखो सुखो नुन माडसे बखत कटो ।।
ठुलिया बुलिया सुननके करम ठोँकि
छाती घसिटके बो घर मडैया रोकि ।।
जा जुगकि हँसि खुशि बो कछु नजानि
लरकनको मुहुँ देखके रहि मुस्क्यानि ।।
खट्टि मिठि खरि बचन सुनि चुपानि
करम अपनो जानि बो रहि लरज्यानि ।।

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