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सोरठ लोककथा

सोरठ लोककथा

धनगढी,२७ बैशाख ।

महल कुइ दैगओ झुकैँया रे ,
हाँ रे धन मेरी सुनी सेज महल कुइ दैगओ झुकैँया रे ।


एक देशमें कक्ष नामको एक राजा रहए । बो राजाके खास नाउ जयचन्द रहए पर पानीभितर बैठनके कारनसे सब बोसे कक्ष राजा कहत रहए । कक्ष राजाके सात रानी रहए । सात रानी मैँसे कोइके फिर बालका न भओ रहए। राजाके थिन धनदौलत के कोइ कमि न रहए पर हजार गजके महलमें किल्कारि मारन बालो कोइ बालका  भि न रहए । बालकाबिना राज महल सुनो रहए । राजमहल अधुरो रहए । सबकुछ होतएहोत फिर राजा बालका बिना दुखी रहए । एक दिन राजा अपन गुरूके बुलाएके बिचरबायी । राजा कहि, मिर तामान साल हुइगए हए बिहाके पर बालका नाभए हए । कि कोइ ग्रहदसा लागो हए । जैसी हए उइसी बताबओ । तव गुरू कहि ,  तिर किस्मतमे बालका त हए पर तिर हाथसे पाप होबैगो । राजा कहि ,  कैसो पाप खुलके बताबओ? फिर गुरू कहत हए ,  तिर घरमें एक कन्याके जलम होबैगो पर तए बोसे पिछु  ब्याहइगो । ऐसी कहिके गुरू बिदाबारी लैके अपनो घर चलोगओ । राजा बहुत सोचमें पडिगओ । रातदिन गुरूके बात समखए । राजा सोचए कि अपनी लौँडियासे बिहा करहओ तओ मोसे बडो पापी और अधर्मी जा दुनियामें कौन होबैगो ।

जिस दिन सोरठ जलमी रे पवन धरे अब लंक
काठ मजुसा खोलके दइ हए समुन्दरबिच डार


कुछ दिन बिते , कुछ महिना और कुछ साल बिते फिर एक दिन राजाके सबसे छोटि रानी गरबबती होतहए। नौ महिना पिछु सोरठ जल्मन बेरा दिउतिन बुढिया रानीके आँखीमें कारो चिथरासे पट्टी बाँधदेत हए । रानीके कोखसे एक सुन्दरसी कन्या पैदा होत हए  पर रानी अपन बच्चक देखनय न पात हए । दिउतिन बुढिया राजा और रानी कोइके फिर सोरठके देखन न दइ । राजा सोनोसे मण्ह्रो दूरसे झल्मलान बारो काठमजुसा बन्बात हए । दिउतिन बुढिया काठमजुसामें सोरठके  धरके समुन्दरमें पुहाए देत हए ।

तर कुमडा माटी खोदए रे उपर बलिया बंश
उठकेन कुमडा देखियो रे एक अचम्मो आए


समुन्दरके धारयधार काठमजुसा पुहत जात हए । जराङ्में काठमजुसा अटक जात हए तव सोरठ रोन लगत हए । पुहन लगत हए तव चुप हुइजात हए । ऐसिअए काठमजुसा  पुहत पुहत  सिरेसे दख्खिन ओर दुरको गाउँमें पुग्जात हए । समुन्दर  किनारे ढाहोमें बलकुमाढ और कुम्डनिया घल्लाके ताहीँ माटी खोदत होत हए ।  समुन्दरमें तमान मछर्हा मछरी मारत होत हए ।  समुन्दरके धारयधार झल्मल झल्मल करत कुछ पुहत आत होत हए । कुमाढ नजर उठाएक देखत हए त एक अचम्मो चिज पुहत आत देखत हए । बो का हए कहिके मछर्हानके दिखात हए । देखन ताही सब मछर्हा दौर पडत हऐँ । पानी मैसे निकारके देखत हए त हीरामोती और सोनोसे मण्ह्रो काठमजुसा । मछर्हा कहत हए कि, जा काठमजुसा हम निकारे हम लेमङ्गे । तव कुमाढ कहत हए कि, मए देखो तव तुम निकारे । उपरके तुम बाँटलेव, काठमजुसा  भितर जो निकरैगो बो मोके दैदिअओ । कुमडाके बात सुनके सब मछर्हा मानजात हए । मछर्हा सोनेके मण्ह्रो चिज सब लैचले जात हए खाली काठमजुसा छोड जातहए । कुम्डनिया अपन लोगासे  कहत हए कि काठमजुसा खोलके देखओ भितर का चिज हए । खोलके देखत हए त बो भितर लौँडिया खेलत होत हए । निरवंशी कुमाढ कुम्डनिया लौँडियाके पायके बहुत खुसी हुइजात हए । बे सोरठके अपन घरे लैचले जात हए ।

यैसी सोरठ सुथरी रे सिँक बरण करेहाँओ
सिँक बोर पानी पियए रे आँट फटए मरिजाए


बलकुमाढ कुम्डनिया अपन लौँडियाके नाउँ सोरठ धरदेत हए । सोरठके अपने सगी लौँडिया जैसो पालत हए । सोरठ बडी अचम्मी लौँडिया होत हए । सोरठ दिखानमे खुब सुथरी होतहए पर सिकाजैसी पतरी होत हए । सोरठ पानी पियत हए त बोके आँटी फटजाबय और मर्जाबए फिर जिन्दा हुइजाबए । ऐसी दिन बितत जातहए । सोरठ धिरेधिरे बडि होत गइ ।

कुछ साल बाद सोरठ जवान हुइजात हए । सोरठ इतनी सुथरी दिखाबए कि जब कुँइयामें पानी भरन जाबए तव प्यासे पानी पियन तलक भुल जामएँ। गाउँ बारे कहएँ सोरठसे जौन ब्याह करैगो बोके भाग खुल्जाबैगो । काम करन इकल्लो सोरठ घरसे बाहिर निकरए । काम ना होबए तव बो घरमे कुचिरहए । सोरठकी ऐया आँगनमें सुखौनो डार जाबए । लौँडिया घरसे बाहिर न निकरए कहिके सोरठकी ऐया आँगनमें सुखौनो डारके लम्बि लसरी बाँधदेबए और सोरठसे कहए ललो री घरसे बाहिर मत निकरिए ऐसी कहिके अपना काम करन चलिजाबए । सोरठ घरए भितरसे मुर्गियनके दलाओ करए ।

एक दिन कक्ष राजा सिकार खेलन जातहए  । सिकार खेलतए खेलत राजा बल कुमाढके गाउँ पुग्जातहए । राजाके जोडसे पानी प्यास लागि अब राजा कुइयामें पानी पियन जातहए  । कौन छेँकमें राजाके नजर सोरठमे पडजातहए । राजा अपन नोकरसे पता लग्बातहए कि कुमाढके घर कौन लौँडिया हए । सर्वगुण सम्पन्न  सोरठके देखतए राजाके मन पड्जात हए । अब राजा  सोरठके अपन रानी बनैया। राजा सोरठके देखन ताही रोज अपन घोडाके सुखौनो खान पठाओ करए । घोडा फिर सिखो । घर भितरसे सोरठ लसरी हलाबए तव घोडा भाजैनाए । घोडा घरिघरि सुखौनो खान आबए सोरठके बाहिर नीकरके घरिघरि दलान पडए । राजा सोरठके देखन ताही ओट बैठोरहए जैसे घोडा दलान बाहिर निकरए  राजा सोरठके खुब देखो करए।

ऐसी दिन बितत गओ । एक दिन कक्ष राजा बलकुमाढके गाउँ आनको खबर गाउँमे फैलबाइ । राजा सात सहेलके साथ गाउँमें आओ । गाउँके सबए लोग, बैयर, लर्का, जमान सब देखन जामए । सोरठ फिर अपन सात सहेलीके संग राजाके देखन गइ । गाउँके सबए मनैनके बिच राजा ठाह्रो होत हए ।बो अपन सखासे पुछत हए कि ,

बरन बरन घैली बनी रे एक बरनी पनिहार
मए तोसे बुझओँ ए सखा रे यिन मैँसे सोरठ कौन ?


इतनो मनैनके बिचमे सोरठ कौन हए । तव राजा के सखा कहि ,
बरन बरन घैली बनी रे एक बरनी पनिहार
सोनेक कलसा सिरय धरे हयेँ बेहीँ सोरठ नार


जौन सोनेक कल्सा मुडमें धरे हए बहे सोरठ हए ।  राजाके आसपास फिर बोके तमान सखा बैठे । सोरठ सिर्फ कक्ष राजाके बारेमे सुनी रहए पर  देखि न रहए । सोरठ अपन सहेलीसे पुछि कि ,
बरन बरन घोडे बने रे एक बरनी असबार
मए तोस बुझओँ ए सखी रे यिनमें राजा कौन ?


जे मैसे राजा कौन हए तव सहेली मस्कि कि,
बरन बरन घोडे बने रे एक बरनी असबार
सोनेक छत्तुर सिरय धरे हयेँ बेही राजा कक्ष


जौन सोनेक छत्तुर सिरमें धरे हए बहे राजा कक्ष हए । राजा और सोरठके बिचमे चिनाजानी भइ । सोरठ कही,
आज बसेढो राजा हिँयए करओ रे देहँओ बढैया खाट
पान सुपारी सिरय गेँदुवा दुधसे फुकारओँ तेरो पाँव


इतनो दूरसे तुम आए हओ । आज तुम मिर घर रात रहिलेव । मिर घरमें पान सुपारी जो जुरयहए बहे खबएहओ और दुधसे तुमर पाँव धोएके तुमर सेबा करहओ । दिलसे तुमर स्वागत करहओ  । राजा सोरठके बात मान लेत हए और सोरठके घरमे रात रहत हए ।
पाँयेन घोडे टपे टपे रे घोडे हिसयेँ दाँत
सोबत सोरठ उजकी रे आए हयेँ राजकुमार


सिर्फ सोरठके ताहीँ कक्ष जैसो बडो राजा बलकुमाढके घरमे रात रहत हए , खानु खात हए  । राजा सोरठसे कहत हए कि मए तुमर घर रहो तुम फिर हमर राजमहल ऐयओ पहुना बनके । सोरठ कहत हए कि ठिक हए मए आमङ्गो । जब सोरठ राजमहल जानक समरन लागत हए तव बोके सहेली कहन लागि कि बो त कक्ष राजा हए पानी भितर रहत हए तए हुवा कैसेके जाबैगो । पानी भितर तए रहिन पएहए । तव सोरठ कहि ह सखी तुम सब ठिकए कहत हओ । सोरठ राजमहल नजानको बात राजासे कहत  हए । राजा सोरठके बात सुनके कहत हए कि ,
तय रानी मतको हिनो कि तेरी ओछी बुध
काहेक बिरा दओ रहए री काहेक लओ घुमाए?


तुम कैसे हओ कभि कहत हओ जैहओ कभि कहत हओ नजैहओ। सोरठ तुमर थिन बहुत बुद्धि तुम दुरतक सोचलेत हओ पर तुम काहे कहे जैहओ फिर काहे कहत हओ नजैहओ । तव सोरठ कहत हए  कि,
न मए रानी मतको हिनो नँए मेरी ओछी बुध
सात सखिनके बोलमें रे बिरा लओ घुमाए


मिर थिन इतनो बुद्धि न हए मए जबैया रहओ पर का करओ सात सहेलीके बोलमे पडिगओ और अपनो बिरा घुमाएलओ । जा चोटि नाए दुसरो चोटि जरूर जामङ्गो ।  राजा दुखी हुइके कहत हए कि,
तुम मण्डिलकी रानिया रे हम पानीके कक्ष
घर घर बाछा ना करओ रे जेही बडेनकी हए रित


तुम मन्डिलमे बैठन बाले और मए पानी मे बैठन बालो । मए तुमर बोल मानके तुमर घरमे रात बैठो । जौनके घरमे रात रहत हए बोके अपन महलमे आनक निउतो देतहए जहे हमर पुर्खनसे चलो आओ रित हए तभि मए तुमके निउतो दओ पर तुम घरिघरि झुठो बाचा मत करेकरओ । मए तुमके अपन रानी बनैया हओँ । अगली चोटी तुमके मए ब्याहन अएहओ । राजाके बात कोइ ना टारपात हयेँ । बलकुमार सोचत हए कि माटिके काम करके जिन्दगी गुजर करन बालेक लौँडियासे कक्ष जैसो राजा बिहा करनको त बहुत बडो सौभाग्य हए । जेहीँ बात सोचके बलकुमाढ सोरठके बिहा करनको हुँकारी राजाके दैदेत हए । राजा बडो खुसीके साथ बिदाबारी लैके अपनो राजनगरी लौट जातहए ।

राजाके घरमें  और राजनगरीमें बडो उत्सबके साथ बिहाके तयारी होन लगो । होना सोरठके घरमें फिर बडो धुमधामसे बिहाके तयारी होबए । राजा बल कुमाढके घर ब्याहन आओ । सोरठ सजके बैठि होत हए । सोरठ राजाके हथियामें बैठो सरमें पगा बाँधे मोखोसे देखत हए । अन्तर ज्ञानी सोरठ जान लेतहए कि जौन राजा ब्याहन आओ हए बो बोके जनम देनबालो बाप हए । फूलसे सजो मण्डपमें कक्षराज झगापगा बाँधे आत हए । फिर सोरठ अपन सखी सहेलिनके संग आत हए । मण्डपके आसपास राजघरानोके लोग, बिहामें आएभए तमान देशके राजारानी, राजकुमार और नगरनगरीके आदमी जम्जमाने होत हए । मण्डपमें राजासे कैसे कहओ कहिके सोरठ समखत हए । फिर सोरठ भ्युँरबान बखत हुँवैपर कहत हए कि,
दबु धरओँ त पगु पडओँ रे पग पग बर्सय पाप
जा कलजुग अनरित हए रे बेटिक ब्याहय बाप


राजा बेटी जयचन्दकी पाली बल कुमाढ
राजा मरहए रोरके तए जितैगो रे खन्धार


उत्तर उत्तर कियुँ न फिरगए उत्तर तुमरो हए देश
देख तुमारी सुरत रे हृदयमें लागो हए चोट


मय तेरी सगी लौँडिया हओ मय जल्मतएक तए मोके काठमजुसामे धरके समन्दरमे पुहाएदओ । मोके बलकुमाढ पालपोसके बडो करी । तय जैसे भिँयुरिके ताही पाँव बढान डटो हए तेरो पाँव पाँवपर पाप बर्सन डटो हए । आज अगर तए मोसे बिहा करो त ज बडो भारी पाप होबैगो । तए कहा जाएके अपन पाप धोबैगो। तए ज जुगमे रोरके मरैगो । मए तोसे बिहा न करहओ । तए जौन डगर आओ हए बहे डगर चलो जा । आज तेरी जा सुरत देखके मनमे बडो चोट लगो हए । सोरठके जा बोल सुनके कक्षराज झस्कत हए और पुरानी बात समख लेत हए । तओ राजा सोरठसे कहत हए कि,
फिर कहो बेटि फिर कहओ रे कहियओ बेही बोल
बेही बोलके कारन घरसे करङ्गो तेरो ब्याह

तए अभे जो जे सारी बात कहो हए एक बार फिर कहो । अगर तए सचमे मिर अपनी बेटि हए मए तेरो बिहा अपन घरसे करबामङ्गो । अपन हाथसे मए तेरो कन्यादान करङ्गो । सबके सामने कक्ष राजा सोरठके अपने बेटिके रूपमे अपनात हए । राजा सोरठकी ब्याह बहे मन्डपमें बडे धुमधामसे सोरठके मन पडो राजकुमारसे  करबाए देत हए । राजा अपन हाथसे सोरठके कन्यादान करत हए ।

राजमहलमें लदबद सन्तानके रूपमे एक बेटि जलमि पर अपन बेटिके बिन देखे राजाके बहान पडिगओ । जब बेटि जवान भइ अपनो बाप ब्याहन गओ । जे बात समखके राजाके मनमे बडो चोट लागो । पर अपन लौँडियाके फिरसे पाएके अपन हाथसे कन्यादान करके कक्ष राजा जा जुगकी रित बचात हए । राजा बडो खुसी होत हए ।

स्रोत:  राममती देवी, गदरिया