चराँइ शब्दकाे उत्पती और महत्व का हए

चराँइ शब्दकाे उत्पती और महत्व का हए

धनगढी , १२ चैत

चराँइ शब्दको उत्पती
चराँइ शब्दको उत्पती काहाँसे भओ सबालमे देवहरियाक मुल्ली राना कि कहाइ अनुसार चर शब्दको अर्थ चरन गाइया , भर्धा चरत हएँ बहे शब्द औ बहेमे जोडदइ आन , आई शब्दको अर्थ कोइ फिर काम करन बुलाओ जात हए । तहिकमारे चराँइ शब्दको शाब्दिक अर्थ हए चरन आन । तराइ क्षेत्रमे घनो जंगल खाली ठाउ होन से बघटा भलुवाको डर होतरहए । तराइके मुलबासी रानाथारु जब जा ठाउमे बैठन शुरुकरी तव बहुत मेलकी बिमारी कालाजर , मलेरिया , हैजा जैसे बिमारी लागत रहए जे सब से काइली कहिके सब जानत रहए । तव उनके काइली विमारी सतान लागी जा विमारीसे गाउ छिछियाए जात रहए औ गाउके गाउ बिमारीसे भसम हुइजात रहए तओ गाउको पधना या भलमन्सा जा से बचन ताँही दुसरे ठाउमे जाइके गाउ बसात रहएँ ।

चराँइ पर्व तिन दाँओ मनात
पहिली चराँइ चैत कि चराँइ जामे खासकरके विन व्याही लौडिय या व्याही लौडिया जौन कि निनाहरोमे होरी खेलन लातरहएँ बे सब जा पर्वको ह्रसउल्लाससे मनात हएँ ।
दुसरी चराँइ बैख्खी चराँइ जा चराँइमे व्याहि लौडिया बइयर खासकरके मनात हएँ ।जा से नयदुलहीन चराँइ फिर कहत हएँ । जा चराँइमे नैदुल्हीनके अनिबार्य लातहएँ । कोइ कारण बस नैदुल्हीन चराँमे नअपाइ कहेसे सब गाउके मिलके डण्ड करनकाे चलन रहएँ ।
तिसरी मेल कि चराँइ कहेस भजनी चराँइ जा चराँइ सब गाउमे नमनात हएँ काहे कि गाउमे आफत विपत पडोबेरा जा मनाइ भइ चराँइ हए । जामे खासकरके गाउभरके बच्चासे लैके जमान सब जनि अपन घर छोडके नाजपानी लैके सात दिन तक गाउसे बहिर जाइके चराँइ चरन चरत रहएँ औ घरमे बुढाबुढीया इकल्लो रहिजात रहएँ । गाउमे काइली पडतरहए तव गाउके आदमी अपन घरसे बाहेर चलेजात रहएँ । जब भर्रा गाउमे थोरी शान्त करपात रहए तव फिर सबके गाउमे बुलातरहएँ तहिकमारे जा मनाइभइ चराँइ हए । अब जा पर्व एक दिन इकल्लाे मनात हएँ बाे मे फिर २।४ घण्टा बैठके पुजापाठ करके अपन घर आ जात हएँ ।
रानाथारु चराँई पर्व का हे मानत हएँ ?
चराँइ पर्व होरी से जुडो तिउहार हए । हरेक कि संस्कृतिमे समय अनुसार तिजतिउहार आतहएँ औ वीसी करके विधिविधान आनुसार मनातहएँ बैहे मैसे हए चराँइ तिउहार । रानाथारु संस्कृतिमे पुस औ महा महिनामे इकल्लो व्याहा करत रहएँ । व्याहा दुई पखिया (पुसकि अँधियारी औ उजियारीमे पुछैसाे करन माघ महिनामे व्याहा ) करतहएँ । अगर कोइ व्याहा चैत या बैशाख महिनामे करन पडो कहेसे पुरी नपाकत रहएँ कहेकी पुरी पकानियाँ ताई होरी धरजात रहए तओ व्याहकी ताइ बैठान नमिलत हएँ । लौट असारी पुजा पुजा पच्छु फिरसे ताइ बैठान पात हएँ । अगर जानबुझके या अनजानमे कोइ आदमी ताइ बैठाइदेत्ते त गाउके आदमी पता पइते डन्ड करनको नियम रहए । भर्रा नियम बनात रहएँ औ पधना,भलमन्सा द्वार करन्व्यन करबात रहएँ । कहत हएँ फागुन महिना लगजात हए कहेसे व्याहाको सिजन निभटगओ और फागुन महिना चढ गओ होरीको सिजन आइगओ ।

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चराँइकाे महात्व का हए ?
चराँइ तिउहार चैत महिनाकी उजियारीके पहिले विस्पत या पहिलो सुम्मारके रोज चराई करो जात हए । चराई एक खेरोको पुजा हए । खेरो कहेको एक गाँउको आसपासको क्षेत्र या गाउके आदमी जहाँतक जोतखोद करत हए हुनतक बो गाउको खेरो मानाे जातहएँ । चराईमे सात भगवती (देवी) को पुजा करहएँ बताइँ बेलौरी नगर पालिका वडा नं. ५ कि पवन देवी रान । दुस्रो कहानी अनुसार होलीका भगपतीसे बर्दान पाइहाेतहए पर होरीमे विष्णु भगत प्रहलाद द्वारा होलीका को दहन पच्छु होलीका कि आत्मा गाउ गाउमे भटकन लागि औ लौडानके, लोगनके ( पुरूष) देख नसुहान लागो औ होलीका अपन बाचि शक्तिसे गाउमे प्रकोप फैलइदइ हुइनसे गाउँमे काइली फैलगइ आदमी मरनलागे शरिरभर फोराफुस्कनी से मरनलागे तव गाउ कि बैयर ( महिला ) एकट्ठा भइ औ लौडा ,लोग ( पुरूष) कि ज्यान कि सुख समृद्धिके ताँहि माता भगपतिके आवहान करी तओ माता भगवती प्रकट हुइके जा प्रकोपसे बचन ताँहि विधिविधान बताइ तहिकमारे चराँइमे भर्रा सातौँ देवीनके मनएँके पुजा करतहएँ ।

धनगढी ७ मनेहरा गाउके भंगी (भगत ) राना कि बात अनुसार गाउमे काइली पडिरहए बहेदेखन सितला देवी मृतलोकमे घुमफिर करन निकरी बुढीको भेषधरके घुमतघामत जातरहएँ तओ एक बइयर ( महिला ) खानुको माडको पानी घरउपरसे फेँकी त देवीके उपर पडगओ देवी चिल्लान लागि कोइबोके बचान नआओ शरिरभर भुजके फोका उछरगए तव एक कुमढक गरिव बइयर बोके उठाएके अपन घर लैगइ जुडो पानीसे सफा करदइ , दहि , मिठो भात पको रहए खानके दाइ जा से सितला देवीके कुछ अराम लागो तव बो सोनलागी कुमढकी बइयर गाेदीमे बैठाएके बुक डिँगर देखन लागि तओ मुडके पच्छु तिसरी आँखी देखके बो जोरसे चिल्लानी तव सितला देवी कहि का हे चिल्लातहए मत डराबय मय भुतसुत नहौ तओ बो अपन पुरोरुप दिखाइ तओ कुमडौरी कहनलागि देवी माता तोके बैठानताँही मिरघरमे कोइठाउ नहए मय गरिब हौ । तओ देवी माता कहि मयतोसे बहुत खुशहौ ले माग का मागैगो तव बो कहि मिरगाउबारे काइलीसे मररहेहएँ उनकी रक्षाकरदे तओ देवी सितला माता पूजाको विधिविधान बताइके हुनसे अन्तरधाम हुइगइ सातौ भवानी मइसे एक भवानी हए सितला देवी माता ।

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गाउँमे जितने लौडियनको व्याहा होत हए उनके ससुरार बालेन्से गाउँको भलमन्सा पुजाके ताँही क्वाँरकाली मागत हए औ लौडाबारे व्याहामे लौडिया बालेक घरमे व्याहाक समान संग प्रसादके रुपमे मिठाइ फिर पठातहए बहे व्याहामे बचि मिठाइ चैतकी चराई के रोज चराँइ चरन बारीनके बाँटो जात हए । कोइ कहत हएँ लौडिया अपन व्याहाके खुशिमे चैतकि चराँइमे मिठाइ बाँटत हएँ बताइ बेलाैरी न.पा ५ भकुन्डा गाउ कि जानमती राना । ऐसी करके व्याही और विना व्याही लौडिया चराई बारे रोज होरी खेलत हएँ । साँझ होतहए तओ होरी जहाँ से आई होनए पठान जात हएँ सबजनि जमुनिक पत्ता लैके चराँइमैसे उठके भुइयाँ घेनजात हएँ । ( कहात हएँ जब चराँइ कि बगीयामैसे आत हएँ ता हुनापर राक्षेस इकल्ले रहिजातहएँ बे बचोखुचो खानुखात हएँ ) जानसे पहिले पधनीयाँ या भलमसैया डगरमे विरझराको काँटो डारत हए सबजनी काँटो नाघके भुइयाँमे टिकालगान जात हएँ औ होरीमे जमुनिक पत्ता डारके पधना घर आतहएँ औ पधनक घरको दिउतामे फिर पत्ता डारतहएँ तओ पधनीयाँ सबयके उपर पानी डारके छुतउतारत हए तओ हुनसे सबजनी अपन अपन घर जात हएँ । घरमे जाइके फिर पानीलेत हएँ तओ घरमे कुचतहएँ बताइ ।

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चराँइमे पूजाको समान
एक दिन अग्गु चाकर घर घरसे उठाओ भओ भेँट औ चराँइबाले दिन गाउँकी बइयर , लौडिया मिठो पकवान दही मिसौला , उसाना आलु , भरुवा भटा , मछरी पकाएके लैजात हएँ । जेही पकवान और सप्तरंगी चीर औ सतनजा पूजाके रुपमे भर्राके देत हएँ । भर्रा सबघरसे आओ भओ प्रसादके रुपमे पुजामे चढात हएँ औ मेरो गाउँमे सुख समृद्धि होबय भगपतीसे संकल्प करत हएँ । घर से लाओ भओ मिठो पकवान सबमिलके बाँटके खातहएँ । जा पर्वमे बरत नबैठत हए पुजा करन समय तक चराँइमे जानबली बइयर कछु नखात हए पर पुजाके पच्छु खानुखालेत हएँ ।

साेधखाेगकर्ता ः नन्दलाल राना ,रानाथारू डटकम ( अध्यक्ष)

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